
शाम के सात बजे हैं पर काम है कि खत्म ही नहीं होता. अरे काम भी कभी खत्म होता है! खैर कल देखा जायेगा. और मैं मेज़ पे बिखरी फाइलें समेटने लगता हूँ. बाहर अंधेरा घिर आया है. अरसा हुआ उजाला रहते घर पहुँचे. हवा में ठंड बढ़ गयी है. आखिर आसपास अभी कुछ खुली जगह है और एक-दो खेत भी हैं. सड़क पर आ गया हूँ. चारों तरफ गुजरती गाड़ियों की लाइटों की चमक, बेतहाशा शोर. ये शहर क्या रात भर सड़कों पर ही रहता है? सभी ज़ल्दी में हैं, न जाने कहाँ जाने की ज़ल्दी है? घर भी आराम से नहीं जा सकते? गाड़ियाँ खतरनाक तरीके से एक-दूसरे को ओवरटेक करतीं हैं. ऊपर से सामने से आती गाड़ियों की आँखें चौंधिया देने वाली हैड-लाइट्स! इन सड़कों से होकर सुरक्षित घर पहुँच जाना भी तो किसी चमत्कार से कम नहीं. और न जाने कितने लोग ये कारनामा हर रोज़ करते हैं. मैं मन ही मन इस चमत्कार को नमस्कार करता हूँ. थोड़ी ही दूर चलने पर, एक मोड़ पर सड़क के किनारे ही एक शराबी किसी से झगड़ा कर रहा है और सामने वाला व्यक्ति बार बार पूछ रहा है कि आखिर बात क्या है, पर शराबी तो हाथापाई पर उतारू है. पता चलता है कि ये तो इस शराबी का रोज़ का शगल है. पास ही इस सबसे अनजान बने हुये दो पुलिसवाले एक ट्रक को रोक कर अपना ज़ेब-खर्च वसूल कर रहे हैं. मैं कभी शराबी से परेशान उस व्यक्ति की ओर देखता हूँ तो कभी पुलिस वालों की तरफ़ और कभी मज़मा लगाये लोगों की ओर. यही सब देखते हुये कब घर आ गया, पता ही नहीं चला और मैं कल फिर इसी ज़द्दोज़हद का सामना करने से पहले खुद को कुछ हद तक तरोताज़ा कर पाने की उम्मीद में तमाम बातों को बरबस ज़हन से निकाल कर मुस्कराता हुआ घर में घुस जाता हूँ.
